Importance of Purushottam Month and How to Observe it

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Purushottam month is the extra month which comes every 2 years, 8 months, and 10 days. The smarta and shakta community call this month ‘mal mash’, meaning ‘dirty month’. In 2023, Purushottam month is from Tuesday 18th July to Wednesday 16th August.

Vedic literature explains the glories of Purushottam month. One example is of Draupadi. In her previous life, she was the daughter of Sage Medha. She heard the glories of Purushottam month from Durvasa Rishi but failed(ignored) to follow it. As a result,she suffered in that life, and in her next life too(as Draupadi with her five husbands). She was forced into exile with her husbands for 12 years, and in the 13th year, they had to be incognito (under a disguise). During her incognito year, she was harassed by Kichak– the soldier general of the kingdom Virat. Jayadrathalso tried to abduct her whilst they were in exile. She became one of the main reasons for the Kurukshetra battle. Her five sons were killed by Ashwathama, which aggrieved her very much.

According to the instructions of the Supreme Lord Sri Krishna, the five Pandavas (including Draupadi) observed Purushottam month and regained their royal position after exile. King Yudishthir became the emperor of the world.

If anyone observes this month properly, then the benefit they get will be a million times more than a vow observed in a regular month. During Purushottam month, people vow to perform activities that will only please the Lord and reject activities that are dishonest and do not please the Lord.

Sage Narayan once explained to Narada Muni in Badrikashram (In Himalaya) how to correctly observe the Purushottam month.

One should bathe during Brahma Muhurta. Bathing in that time period in the ocean or in a river is considered to be the ‘uttamsnyan (Bathing)’ – the best place. Bathing in a well, lake or a pond is madhaymsnyan – ‘middle category’. Bathing inside the house isGrihesnyan – the least preferable option. After bathing, one should wear fresh devotional clothes, sit on a purified asana (sitting mat), do achaman, apply Vaishnava tilak (urdha-punda), follow minimum ritual and according to one’s qualification, they should worship Krishna.

Even those who are not devotees should observe as follows:

With regards to what should and should not be consumed, it is better to do ‘hobishanna’.Hobishanna means to boil grains (rice/millet/wheat/buckwheat/quinoa) mixed with dhal (lentils) and vegetables, adding onlyrock salt and ghee.

Vegetables and other items that can be consumed are:

green peas, spinach, ginger, radish, potato, taro, yam, banana, yogurt, clarified butter (ghee), mango, jackfruit, long pepper, cumin, tamarind, custard apple (ātā), gooseberry (amalaki), raw sugar, sugar candy (michhri),and ash gourd (Chal-Kumra). Only cow’s milk, buffalo milk and goat’s milk can be consumed. All other types of milk are non-vegetarian (according to the Vedic vision).

Food should not be cooked with oil, but instead, boiled and complimented with ghee. The benefits of observing a fast and doing hobishanna are the same. All food cooked should be offered to the Lord and then honoured as prasad.However, we should not accept any grains on the day of Ekadashi. On Ekadashi one should only take fruits, roots, water and milk.

Restricted foods:

Fish, meat, onion, garlic, honey, mustard seeds, chick-peas, chickpeas dhal, sesame oil, mushroom, carrots, green-squash (loki or Lau), egg plant (Begun), tomato, all types of beans, (including soya beans), and any kind of intoxication. Anything containing animal extracts should not be consumed, mashuri dhal (red lentils) and lime (Gnora-lebu) should not be taken. Cooked rice any other applicable food in this month from the previous day should be avoided.

In this month, we should absolutely avoid criticism of gods and goddesses (dev and devi), Veda, Guru, cow, anyone observing this vow, women, kings and saintly persons (Sadhu Ninda).

The observer should hear Srimad Bhagavatam and Mahajana-Padavalikirtan with glorifying the Supreme Lord and His pure-devotees. Devotees should try their best to worship Shaligram. This vow is better than performing fire sacrifice. This is because the yagna takes one to heaven (which is part of the material planetary system where we have limitations). When one’s pious credit runs out, they will have to leave heaven and return to this material world again.

Whoever performs this Purshottamvrata will have the holy places (tirtha), gods, and goddesses reside in the person’s body. One should offer a ghee lamp twice a day to the Lord. If ghee is unavailable, then one can use sesame oil instead. This vrata will give sixteen times more benefit than the benefit one gets from Brahma gyan (Impersonalism), Ashtanga yoga (physical yoga), Sankhyagyna and tantra (black magic).

In ancient times, Maharaj Indradyumna, Maharaj Jaubanashva, and Maharaj Bhagirath all observed this vow and they got the benefit of reaching the same abode of the Lord’s abode – samipya (among the 5 types of liberation – mukti).

Koudinya Muni used to chant this mantra regularly in Purushottam month.

Goverdhana Dharam vande Gopalang goporupinag

Gokulutsavanishanam Govinda gopika priyang.

Who lifted the Goverdhan Hill, that is Gopal, in the form of Gopa, the cowherd boy. Who is the master of festival in Gokul Mahavan, that Govinda who used to go for cowherding is the beloved of all the gopis (Radharani’s assistances).

Whilst chanting the mantra, we should meditate on this form of Krishna and His pastimes, and fix our mind on Krishna.

Koudunya Muni attained perfection by gaining the vision of Purushottam Dev (Lord Sri Krishna).Therefore, the observer should chant it at least 3 times a day, or if possible, more.

B.B.Bodhayan Swami
President, Sri Gopinath Gaudiya Math
15th July 2023

श्री पुरुषोत्तम मास व्रत महिमा तथा पालन विधि

वैष्णव पथ के अनुगामी पुरुषोत्तम माह का विशेष रूप से पालन करते हैं क्योंकि यह परम भगवान से अभिन्न है। हमें अपने पूर्ववर्ती आचार्यों से ज्ञात होता है कि मर्यादा अवतार भगवान श्रीरामचंद्र (मर्यादापुरुषोत्तम), लीलावतार भगवान श्रीकृष्णचंद्र (लीला पुरुषोत्तम ) तथा प्रेमावतार भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु (प्रेम पुरुषोत्तम), ये सभी हमारे लिए पुरुषोत्तम है ।’पुरुषोत्तम’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, एक ‘पुरुष’ दूसरा ‘उत्तम’ ,पुरुषोत्तम शब्द का अर्थ है ‘उत्तम पुरुष’।

पुरुषोत्तम मास अधिक मास है। पंचांग में चंद्र चक्र तथा सौर चक्र के मध्य समन्वय बनाए रखने के लिए प्रत्येक दो वर्ष आठ महीने और दस-पन्द्रह दिनों के अंतराल के पश्चात एक अतिरिक्त महीना आता है, जिसे ‘पुरुषोत्तम महीना’ कहा जाता है। अन्य संप्रदायों के अनुयायी इसे प्रत्येक कार्य के लिए अशुभ मानते हैं। स्मार्त्त एवं शाक्त संप्रदाय में इसे मलमास कहा जाता है किंतु वैष्णवगण अपने भजन-साधन की वृद्धि के लिए इसे अतिउत्तम मानते हैं। हमारे लिए यह श्रीहरि से अभिन्न है, इसलिए हम अपने गुरुवर्ग की आज्ञानुसार इस महीने में अधिक से अधिक परम भगवान को स्मरण करने का प्रयास करते हैं। इस वर्ष मंगलवार 18 जुलाई 2023 से बुधवार 16 अगस्त 2023 तक पुरुषोत्तम मास है। 

वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन किया गया है। इसका एक वृतांत द्रौपदी से भी संबंधित है। द्रौपदी अपने पूर्व जन्म में मेध ऋषि की पुत्री थीं। उन्होंने दुर्वासा ऋषि से पुरुषोत्तम मास की महिमा का श्रवण किया था किंतु उसका पालन नहीं किया। परिणामस्वरूप उन्हें अपने उस जीवन में तथा द्रौपदी के रूप में अपने अगले जन्म में अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। द्रौपदी को अपने पतियों के साथ बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा। अज्ञातवास काल में उन्हें विराटनगर राज्य के सेनापति कीचक द्वारा प्रताड़ित किया गया। वनवास काल में जयद्रथ ने उनका अपहरण करने का प्रयास किया। वे महाभारत युद्ध का मूल कारण बनी। अश्वत्थामा के द्वारा उनके पाँचों पुत्रों का वध कर दिया गया जिसके कारण वे अत्यंत शोकाकुल रही। 

परम भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश पर द्रौपदी सहित पांचों पांडवों नें पुरुषोत्तम मास व्रत पालन किया और वनवास के पश्चात अपने राजकीय सम्मान को पुनः प्राप्त किया। महाराज युधिष्ठिर संपूर्ण विश्व के राजा बन गए। यदि कोई व्यक्ति इस मास का भली-भाँति पालन करता है तो उसे किसी सामान्य मास में व्रत पालन की तुलना में दस लाख गुना अधिक फल प्राप्त होता है। 

पुरुषोत्तम मास में भक्तगण केवल उन्हीं कार्यों को करने का संकल्प लेते हैं जिनसे भगवान प्रसन्न होते हैं। बद्रिकाश्रम में एक बार नारायण ऋषि ने नारद मुनि को बताया था कि पुरुषोत्तम मास का पालन किस प्रकार करना चाहिए।

प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करना चाहिए। समुद्र अथवा नदी  में स्नान उत्तम कोटि , कुएं अथवा जलाशय में स्नान मध्यम कोटि का माना जाता है । घर में स्नान (गृह स्नान ) साधारण विकल्प माना गया है। स्नान के पश्चात भजन साधन के अनुकूल स्वच्छ वस्त्र धारण कर आसन पर बैठकर आचमन तथा ऊर्ध्व पुण्ड्र तिलक (वैष्णव तिलक) धारण कर अपनी योग्यतानुसार विधि नियमों का पालन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करनी चाहिए । यहाँ तक कि जो लोग भक्त नहीं है उन्हें भी निम्नलिखित विधानों का पालन करना चाहिए । 

केवल हविष्यान्न ग्रहण करना ही उत्तम है । हविष्यान्न का अर्थ है, दाल-सब्जियों के साथ केवल उबला हुआ अन्न (गेहूं ,चावल, मिलेट्स, कुट्टू, किनुआ इत्यादि) सेंधा नमक और घी डालकर ग्रहण करना चाहिए।

मटर, पालक, अदरक, मूली, आलू, अरबी, रतालू, केला, दही, घी, आम, कटहल, काली मिर्च, जीरा, इमली, शरीफा, आँवला, खांड (अपरिष्कृत चीनी), मिश्री, सफेद पेठा एवं गाय भैंस अथवा बकरी का दूध (वैदिक दृष्टि से अन्य दूध को मांसाहारी तुल्य माना गया है) खाद्यों को ग्रहण किया जा सकता है। इस मास में सब्जियों का प्रयोग कार्तिक मास के अनुरूप ही किया जाता है। 

भोजन बनाने में तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उबले भोजन में घी का प्रयोग किया जा सकता है। व्रत पालन करना अथवा हविष्यान्न ग्रहण करना एक समान ही माना गया है । कुछ भी भोजन ग्रहण करने से पूर्व उसे भगवान को अर्पित कर तत्पश्चात उसे प्रसाद के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए। पुरुषोत्तम मास में एकादशी तिथि यथावत् पालन करते हुए  केवल दूध ,जल, कंद मूल एवं फल ग्रहण करना चाहिए।

पुरुषोत्तम मास में निषिद्ध भोजन- मांस ,मछली, प्याज, लहसुन, शहद, सरसों, चने, तिल, कुकुरमुत्ता, गाजर, लौकी, बैंगन, टमाटर, सभी प्रकार की फलियाँ, सोयाबीन, मसूर दाल, नींबू, किसी भी प्रकार का नशीला पदार्थ तथा पहले दिन का पका हुआ भोजन (बासी भोजन)।  हमें सदैव ही देवी-देवताओं, वेद, गुरु, गौ साधु आदि की निंदा से दूर रहना चाहिए। 

इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को भगवान के शुद्ध भक्तों एवं भगवान की महिमा का गुणगान करने वाले महाजन पद्यावली कीर्तन तथा श्रीमद्भागवतम् का श्रवण करना चाहिए। हमें इस मास में हरे कृष्ण महामंत्र का अधिक से अधिक जप करते हुए दिव्य युगल श्रीश्रीराधाकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। भक्तों को शालिग्राम पूजन करने का अपना सर्वोत्तम प्रयास करना चाहिए। 

इस व्रत का ब्रह्मज्ञान, अष्टांग योग, सांख्य योग और तंत्र से सोलह गुना अधिक फल प्राप्त होता है। इस व्रत का पालन करना अग्निहोत्र यज्ञ करने से भी श्रेष्ठ है क्योंकि यज्ञ से तो केवल स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जहाँ से पुण्य क्षीण होने पर जड़ जगत में पुनः आना पड़ता है। जो भी व्यक्ति इस पुरुषोत्तम व्रत का पालन करता है उसकी देह में सभी तीर्थों तथा देवी देवताओं का वास होता है। 

प्रतिदिन दिन में दो बार घी का दीप जलाकर भगवान को दीपदान अर्पित करना चाहिए।  घी उपलब्ध ना होने पर तिल का तेल प्रयोग किया जा सकता है।  दीपदान के समय हम गुरुवर्ग द्वारा रचित भगवान की महिमागान के लिए हमारे पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा रचित पदों का गान कर सकते हैं, जैसे-  व्रजे प्रसिद्धम्  नवनीत चोरम्  (बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा रचित चौराष्टकम्),  नमामीश्वरम् सच्चिदानंद रूपम् (पद्म पुराण अंतर्गत श्रीकृष्ण द्वैपायन महामुनि वेदव्यास द्वारा रचित एवं श्रीसत्यव्रत मुनि द्वारा कीर्तित दामोदराष्टकम्),  जगन्नाथ स्वामी नयनपथ गामी (जगन्नाथ अष्टकम) अथवा भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण ,श्रीचैतन्य महाप्रभु केंद्रित कोई भी अष्टकम् अथवा प्रार्थना का कीर्तन करना चाहिए। प्राचीन काल में इंद्रद्युम्न महाराज, भगीरथ महाराज आदि सभी ने इस व्रत का पालन कर भगवत् धाम प्राप्तकर सामीप्य मुक्ति प्राप्त की है।  

कौड़िन्य मुनि पुरुषोत्तम मास में नियमित रूप से निम्नलिखित मंत्र का जप करते थे। 

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालम्  गोपरूपीणम्

गोकुलोत्सवमीशानम् गोविंदम् गोपिकाप्रियम्

अर्थ- मैं गोवर्धन धारण करने वाले गोपरूप गोपाल की वंदना करता हूँ । वे गोकुल महावन के उत्सव के ईश्वर हैं और गोपियों के प्रिय गोविंद हैं।  

इस मंत्र का जप करते हुए हमें भगवान श्रीकृष्ण के गोप रूप और उनकी लीलाओं का स्मरण करना चाहिए। इस मंत्र के द्वारा ही कौड़िन्य मुनि ने पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन किया। इसलिए इस व्रत का पालन करने वाले भक्तों को इस मंत्र का दिन में कम से कम तीन बार जप करना चाहिए और यदि संभव हो तो और अधिक करना चाहिए। 


श्रीभक्तिविबुध बोधायन
सभापति आचार्य, श्री गोपीनाथ गौड़ीय मठ
15th July 2023